सेहत के खतरे से जूझता छात्रावास की छात्राओं का भविष्य

बैतूल

हीमोग्लोबिन की कमी बनी समस्या

कस्तूरबा गांधी छात्रावास भी कुपोषण से अछूते नही है

बैतूल । मॉ पिता सोच रहे है बेटी पढ़ लिखकर कुछ बनेगी पर यह एक सपना बनकर रह गया है ।यहाँ तो पढ़ाई करने गई मासूम भी हीमोग्लोबिन की कमी से जूझ रही है चेहरा सफेद नजर आ रहा है । हर दम शरीर थका थका नजर आ रहा है और बालिकाओं के वजन ऊँचाई के अनुसार नही है ।तो फिर इसे रक्त अल्पता,एनीमिक ,या फिर सीधे तौर पर कुपोषित ही कहे तो अतिश्योक्ति नही होगी। यह दास्तान बैतूल जिले में संचालित अत्याधुनिक बालिका छात्रावासों के है जहाँ सरकार ने धन की कमी महसूस नही होने दी और आदिवासियों छात्राओं के खानपान और शैक्षणिक गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखने के उद्देश्य से सालाना एक एक छात्रावास पर 50 लाख रुपये सिर्फ खानपान पर खर्च हो रहे है।भरोसेमंद सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि इन 4आश्रमो में जिले में छह सौ छात्राएं निवासरत है और इन्हें भी पौष्टिक भोजन नसीब नही हो रहा है ।रोज सुबह उठने के बाद दिनचर्या से निपटने के बाद इन्हें दूध से लेकर मौसमी फल तक देना है पर दूध की जगह पानी नसीब हो रहा है ।पौष्टिक आहार की जगह साधा भोजन जिसमे दाल रोटी चावल दिया जा रहा है वो भी भरपेट नही । न तो पौष्टिक नास्ता और नही पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है।
छात्रावास में रहने वाली इन छात्राओं को भविष्य में रक्त की कमी से जूझना पड़ता है इसलिए जिले के सरकारी आश्रम और छात्रावासों में रहकर पढ़ाई करने वाली हर छात्रा का समय समय पर हीमोग्लोबिन की जांच की जानी चाहिए ।

शिक्षा की गुणवत्ता भी संदेह के घेरे में

6वी कक्षा से आठवीं कक्षा तक अध्ययन करने वाली छात्राए भयभीत नजर आती है ।25 छात्राओं पर 1अतिथि शिक्षक भी इन छात्रावासों में नजर नही आते है ।जिससे पढ़ाई तो दूर का सपना बन गया है ।

आखिर इन छात्रावासों से पास आउट कहा है ?

कहते है पूत के पाव पालने में ही पहचान लिए जाते है परंतु इन छात्रावासों से पासआउट हुई छात्राएं आखिर कितनी 12पास हुई इस ओर सरकारी तंत्र ने कभी नही देखा हालात बताते है कि ज्यादातर छात्राएं 9वी कक्षा में ही फेल हो जाती है और फिर माता पिता उन्हें घर के कामकाज मे ही लगा देते है और अपनी किस्मत को कोसते है कहते है आखिर तुझे छात्रावास में रहने पढ़ने भेजा न पढाई कर सकी न आगे पढ़ पाएगी ।यदि इन छात्रावासों में निवासरत 600 छात्राओं की बीती 10 बरस की स्थिति देखे तो जमीनी हकीकत देखकर जिले के अच्छे अच्छे राजनेता और जिले को संचालित करने वाला सरकारी तंत्र भी बगले झांकने लगेगा।
60 प्रतिशत से ज्यादा तो 9वी कक्षा में ही फेल हो जाती है वही 10 कक्षा में पहुची 40 प्रतिशत में से कभी 10 प्रतिशत तो कभी जोड़ा ज्यादा ही पास हो जाती है ।हालात ये है कि इन छात्रावासों से आठवी पास होकर निकली 600 सौ छात्राओं में से 12वी तक कितनी पहुचती है और फिर कितनी छात्राए कालेज के द्वार जाती है यह कोई देखने वाला नही है ।

कितने सेहतमंद हैं छात्राएं

इसका पता लगाने का सबसे आसान तरीका है खून में हिमोग्लोबिन की मात्रा का पता करना। शरीर में अगर अच्छी मात्रा में हिमोग्लोबिन है तो आप सेहतमंद जीवन बिता रहे हैं वरना आयरन, विटामिन बी, फोलेट,केल्सियम आदि की कमी जैसी समस्याओं के अलावा आप कई बीमारियों के शिकार हो सकते हैं।

महिला बाल विकास के मानें तो आंगनवाड़ियों में समय-समय पर बच्चों के साथ-साथ महिलाओं और किशोरी बालिकाओं का स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है और हरी सब्जी के साथ-साथ विटामिन सी से भरपूर पोषण आहार खाने के लिए जागरूक किया जा रहा है.