कांग्रेस ने पूर्व में दिए बेरोजगारी के जख्म पर इस बार भी नहीं लगाया मरहम

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90 के दशक के लाखों बेरोजगार नौकरी और बेरोजगारी भत्ते से वंचित

भोपाल । लोक सभा चुनाव करीब आते ही चुनावी लालीपॉप दिखाने का सिलसिला शुरू हो चुका है इसी तर्ज पर युवाओं को रोजगार व बेरोजगारी भत्ता देने की कमलनाथ सरकार ने कैबिनेट में घोषणाएं भी कर दी है । लेकिन इस घोषणा में उम्र की सीमा 21 से 30 वर्ष रखी गई है। यानि 2010 के दशक के बेरोजगार युवाओं को ही इसमें शामिल किया गया है। लेकिन आज से लगभग 15 वर्ष पहले 1993 से 2003 तक जब कांग्रेस के दिग्विजयसिंह का शासनकाल था उस दौरान नौकरियां और रोजगार पूर्णत: प्रतिबंधित थे और 1990 के दशक में रोजगार कार्यालय में पंजीकृत लाखों युवा अपनी शिक्षा पूर्ण कर नौकरियों की तलाश में भटकते रहे किंतु उस समय प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने उनकी सुध तक नहीं ली। हालांकी युवाओं के प्रति प्रदेश की कांग्रेस सरकार को असंवेदनशील रवैया अपनाने का खामियाजा पूरे प्रदेश से हटकर चुकाना पड़ा । जिसके बाद भाजपा का शासनकाल आ गया। तब तक सारे युवा शासकीय नौकरी की उम्र की सीमा पार कर चुके थे और ओवर एज होने की वजह से उन्हें आज पर्यंत नौकरी नहीं मिल पाई । कांग्रेस सरकार प्रदेश से जाकर पुनः वापस आ गई किंतु लाखों युवाओं के भविष्य से कांग्रेस सरकार द्वारा किये गये खिलवाड़ का खामियाजा सिर्फ युवाओं को ही भरना पड़ा। हाल ही में 2019 में फिर से कांग्रेस ने प्रदेश की कमान संभाली है और आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर समाज के सभी वर्गाे को कैप्चर करने राजनीति की शतरज पर मोहरो की चाल शुरू हो गई है। इसी के तहत युवा वर्ग को रिझाने कैबिनेट में घोषणा भी कर दी है। मध्यप्रदेश की कमल नाथ सरकार द्वारा शुरू की गई युवा स्वाभिमान योजना अंतर्गत शहरी बेरोजगार युवाओं को वर्ष में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई है। योजना का लाभ 21 से 30 वर्ष आयु समूह के ऐसे शहरी युवा ले सकेंगे जिनकी आय अधिकतम 2 लाख रूपये वार्षिक हो तथा वे बेरोजगार हो। ऐसे युवाओं को प्रतिमाह 4 हजार रूपये स्टाइपेंड ( बेरोजगारी भत्ता) प्रदान किया जायेगा। वहीं 180 नगरीय निकाय में स्किल ट्रेनिंग भी दी जाएगी। इस योजना के क्रियान्वयन पर लगभग 1500 करोड़ रूपये का अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा। (21 से 30 वर्ष) उम्र के इस बंधन के अलावा प्रदेश सरकार ने उन युवाओं के बारे में क्षणिक भी विचार नहीं किया जो 1990 के दशक सें बेरोजगारी का दंश आज भी झेल रहे है । राजनीति के खेल में समय बीतता गया और और 90 के दशक के युवा आज युवा न कहलाकर अधेड़ कहलाने लगे है । लेकिन बेरोजगार तो आज भी है और अपनी जीविकोपार्जन के लिए शिक्षित होकर भी दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर है। उनके बारे में न तो तब सोचा और न अब। फिलहाल यह आलम है कि भले ही प्रदेश का सारा खजाना खाली हो जाए , प्रदेश गले तक कर्ज में डूब जाए , लेकिन मुख्य टारगेट लोकसभा चुनाव को हर हाल में जीत कर पूरा करना है न की बेरोजगारो की सुध लेना।